सोमवार, 21 जुलाई 2025

लिखे कैसे

 

मन की बात तुम्हे दिखे कैसे

अब इतना कोयी लिखे कैसे


तू मिले सबसे और हम देखें

कौन कहां कीधर किसे कैसे


रख पहचान हर एक से वर्ना

बेरुख़ी  में  रहेंगे  टिके  कैसे


इक फूटी कौड़ी के भी ना थे

तेरी मुहब्बत  में  बिके  कैसे


भूल आगे  पीछे अभी में जी

देखें ज़िन्दगी फिर पिसे कैसे


जिन्हे समझ भी नही आते हम

उन के  शोर  हैं  कि  इसे  कैसे


रात जले  काले हुए  'दीपक’

अज़माये थे तो  फिके  कैसे

शनिवार, 23 मार्च 2019

ये ज़रूरी तो नहीं

                           

ज़िंदगी के हर सवाल का जवाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ।
बाग़ के हर काँटे का पौधा गुलाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ॥


कभी ठोकर कभी दर्द कभी परेशां होकर लिखा मैंने ।
ग़ज़ल का मेरा हर शेर लाजवाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ॥


हम तो हर शोख़ नज़रों में अपने को उतारा करते हैं।
हर हंसी चहेरा को छुपाए नक़ाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ॥


दोस्ती का उसको सबक़ पढा रहे थे हम सफ़ा दर सफ़ा।
अमल उसका मुझ पर बेहिसाब हो ये ज़रूरी तो नहीं


                                                                          -दीपक