ज़िंदगी के हर सवाल का जवाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ।
बाग़ के हर काँटे का पौधा गुलाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ॥
कभी ठोकर कभी दर्द कभी परेशां होकर लिखा मैंने ।
ग़ज़ल का मेरा हर शेर लाजवाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ॥
हम तो हर शोख़ नज़रों में अपने को उतारा करते हैं।
हर हंसी चहेरा को छुपाए नक़ाब हो ये ज़रूरी तो नहीं ॥
दोस्ती का उसको सबक़ पढा रहे थे हम सफ़ा दर सफ़ा।
अमल उसका मुझ पर बेहिसाब हो ये ज़रूरी तो नहीं॥
-दीपक
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